अपने थे पराये 20:10 लोहे के चनों को आंसुओं में भिगोकर ग़म के बख़त हमने हंस-हंस के खाये. कंधों में अर्थी थी अपने अभागों की ज़ालिम थी दुनिया हमें ज़बर...Read More
बुद्धिजीवियों की कला... 23:25 स्याओं और कुकुरों का दल इधर भी था और उधर भी था, कुछो को तो मल खाने की आदत वैसे तो पुरानी ठैहरी, मगर उन्हें देख-देख के कुछ एक स्याव औ...Read More
एक गली के कुछ कुत्ते.... 19:50 एक गली के कुछ कुत्ते सारे गली के बांकी कुत्तों से कुछ अलग हो गए हैं. दरअशल वो बाक़ी कुत्तों से कुछ अलग दिखना चाहते है कुछ अलग तऱीक...Read More
उठो ! अब जाग भी जाओ ! 03:03 बुग्यालों को रौंदकर नदियों को खोदकर जंगलों को नोचकर विकास हो रहा है बल उस मुलुक में जहाँ बच्चे छोटू बनकर आज भी जा रहे ह...Read More
एक कविता मेरे स्वर्गीय पिता जी के नाम 20:48 यूँ तो तुम हमें छोड़कर कही दूर चले गए थे कई सालों पहले मगर फिर भी तुम ज़िंदा हो मेरी आँखों में...... मै तुम्हारी उंगुलियों...Read More
उफ़्फ़ ! ये बारिश भी ना 23:54 उफ़्फ़ ! ये बारिश भी ना कहीं भी गिर जाती है बिना कहे - बिना समझे, ना तो पगली का कोई ईमान है ना ही कोई मज़हब फिर भी बरस पड़ती है ...Read More
अबे ओ ! मजदूर 21:19 अबे ओ ! मजदूर आखिर यूँ ही अपनी कब तक मरवाएगा | हवाओं में उड़ने वालों से अपनी ऐसी की तैसी कब तक करवाएगा || पूंजीवादी मादा मच्छरों से ...Read More