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' बिखरे शब्द ' हिंदी कविताओं का संग्रह

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अपने थे पराये

20:10
लोहे के चनों को  आंसुओं में भिगोकर  ग़म के बख़त हमने  हंस-हंस के खाये. कंधों में अर्थी थी  अपने अभागों की   ज़ालिम थी दुनिया  हमें ज़बर...Read More

बुद्धिजीवियों की कला...

23:25
स्याओं और कुकुरों का दल इधर भी था  और उधर भी था, कुछो को तो मल खाने की आदत वैसे तो पुरानी ठैहरी, मगर उन्हें देख-देख के कुछ एक स्याव औ...Read More

एक गली के कुछ कुत्ते....

19:50
एक गली के कुछ कुत्ते  सारे गली के बांकी कुत्तों से  कुछ अलग हो गए हैं. दरअशल वो बाक़ी कुत्तों से कुछ अलग दिखना चाहते है   कुछ अलग तऱीक...Read More

उठो ! अब जाग भी जाओ !

03:03
बुग्यालों को रौंदकर  नदियों को खोदकर  जंगलों को नोचकर  विकास हो रहा है बल  उस मुलुक में  जहाँ बच्चे छोटू बनकर  आज भी जा रहे ह...Read More

उफ़्फ़ ! ये बारिश भी ना

23:54
उफ़्फ़ ! ये बारिश भी ना कहीं भी गिर जाती है  बिना कहे - बिना  समझे, ना तो पगली का कोई ईमान है  ना ही कोई मज़हब फिर भी बरस पड़ती है  ...Read More

अबे ओ ! मजदूर

21:19
अबे ओ ! मजदूर  आखिर यूँ ही  अपनी  कब तक मरवाएगा | हवाओं में उड़ने वालों से  अपनी ऐसी की तैसी कब तक करवाएगा || पूंजीवादी मादा मच्छरों से ...Read More

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