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उठो ! अब जाग भी जाओ !

बुग्यालों को रौंदकर 
नदियों को खोदकर 
जंगलों को नोचकर 
विकास हो रहा है बल 
उस मुलुक में 
जहाँ बच्चे छोटू बनकर 
आज भी जा रहे है 
तराई भाबर के होटलों में 
प्लेटों को धोने 
जमीनों को बेचकर 
घोटालों को सहेजकर 
माफियाओं से झेंपकर 
कुछ लोग राज कर रहे हैं बल
उस मुलुक में  
जहाँ गाँव के गाँव 
ख़ाली हो रहे है 
जा रहे हैं परदेशों में 
कुछ चन्द रोटियों के लिए .....

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