एक कविता मेरे स्वर्गीय पिता जी के नाम
यूँ तो तुम हमें छोड़कर
कही दूर चले गए थे
कई सालों पहले
मगर फिर भी तुम ज़िंदा हो
मेरी आँखों में......
मै तुम्हारी उंगुलियों को आज भी
महसूस करता हूँ अपनी बंद मुट्ठी में
जब भी गला भर आता है आज
तो कहीं से आपके कदमों की आहट को मैं महसूस करता हूँ
जब डबडबाती आखें गिराने लगती है
आंसुओ की धार
तब कहीं से आपकी बांहे लपककर
गोद में उठाना....
मै महसूस करता हूँ
जब कभी गलत कदम उठते है मेरे
तब आपकी डाँठने की आवाज़ को
मै आज भी महसूस करता हूँ
जब कभी माँ को
तब माँ के ख़यालों में
आपको जिन्दा पाता हूँ
तुम हो ही नहीं इस दुनिया में
मगर कुछ पल के लिए ही
तुम जिन्दा हो
और जिन्दा रहोगे
मेरी जिंदगी के कदम कदम पर
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