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अपने थे पराये

लोहे के चनों को 
आंसुओं में भिगोकर 
ग़म के बख़त
हमने 
हंस-हंस के खाये.
कंधों में अर्थी थी 
अपने अभागों की  
ज़ालिम थी दुनिया 
हमें ज़बरदस्ती रुलाये.
सोचा था संभलेंगे 
खुद ही के दम पर 
लूटी थी हिम्मत....
हाँ !
अपने ही थे पराये.....

सर्वाधिकार सुरक्षित 

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