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बुद्धिजीवियों की कला...

स्याओं और कुकुरों का दल
इधर भी था 
और उधर भी था,
कुछो को तो मल खाने की आदत
वैसे तो पुरानी ठैहरी,
मगर उन्हें देख-देख के
कुछ एक स्याव और कुकुर,
डोंराट पाड़ते-पाड़ते
झुण्ड से परे बोल लेते है,
ना ही उन्होंने 
कुछ किया था 
ना ही उन्होंने 
अपने समाज में 
अपने जीवियों को
मल खाने से रोका,
ना ही उन्होंने
उन कमजोर जीवों के लिए 
कभी कुछ किया
बस ! भौंकते रहे 
हड्डियां चूसते रहे 
टुटाट पाड़ते रहे 
सुबह-सुबह मनहूसों की तरह, 
उनकी खास आदत-   
खम्बे से टांग उठाकर 'करना'
को वो अब 
काफी विकसित कर चुके है 
और दूसरों के फट्टे में 
टांग अड़ाने की कला    
आज नंबर एक की 
बुद्धिजीवियों की 
कला बन गयी है बल ....


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