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एक कविता (सर्वाधिकार सुरक्षित)

वो शायद एक छोटी सी नदी थी 
जिसके किनारे हम अक्सर जाया करते थे
वो पुराना पेड़ याद है ना 
जिस पर मैने तुम्हारा नाम लिखा था 
और लिखा था कि-
"शहज़ादी जी हम आपसे बहुत प्यार करते है"
हाँ ये देखकर तब तुमने 
उसे झूठ-मूठ का मिटाने का 
नाटक जरूर किया था 
पर आपने भी तो ये 
दिल से कभी नहीं चाहा
कि वो मिटे
वो बड़ा सा पत्थर याद है ना
जिस पर हम निशाना लगाते थे
और बोलते थे
कि "उस पर लगे तो प्यार
नहीं लगे तो कुछ भी नहीं"
पर कहाँ लग पाती थी ना उसमें
खैर मेरा तो निशाना ही गलत था
और आप भी तो नहीं लगा पाती थी ना
सटीक निशाना,
पर पता नहीं
हम दोनों के निशाने
एक दूसरे के दिलों पर
कैसे लग गये?
पर तुम्हे तो इंकार भी था ना
तब मेरी मोहब्बत पर
अब इकरार कैसे ....... 
भास्कर आनंद "पागल कवि"

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