चांद से रिश्ता (सर्वाधिकार सुरक्षित)
तुम्हें ना जब भी याद आयेगी मेरी
तो तुम
अपनी साड़ी का पल्लू
संभालते-संभालते
छत पर दौड़ी चली जाना
और कुछ पल के लिये
उस चांद को देखती रहना
निहारती रहना
जब तक की तुम्हें
हंसी ना आ जाये
और तुम पागल ना कह दो मुझे
आखिर चांद से भी तो
मेरा रिश्ता है
मैने उस पर सैकड़ो कविताएं
जो लिखी है
सिर्फ तुम्हारी ख़ातिर..... भास्कर आनंद "पागल कवि"
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