एक गीत (सर्वाधिकार सुरक्षित)
ये राहे अनजाने से
ये मंजिल अंजानी सी
हो एक कतरा जो हवाओं में
चुभता है मेरे सीने में
पेड़ों के शाखों के बीचों में
धुंद से मिली सूरज की रौशनी
फैली है मेरे रुबरू
ये तेरा आंचल जैसा लगता है
शबनम की बूंदे जो
अरे ! गिरती है सूखे पेड़ों से
मेरे तन और बदन की रूहानी को ......
ये राहे अनजाने से
ये मंजिल अंजानी सी... भास्कर आनंद "पागल कवि"
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