घर के एक कोने की खूंटी में टंगा बाबू जी के पुराने कोट सी मेरी धूसर भरी जिंदगी रोज देखती है विविध आयामों को भिन्न-भिन्न चेहरों को बहुत सारे घटकों को बस ! मजबूर हूँ क्योकि ? मै टंगे-टंगेखूंटी से अब तार- तार हो चुका हूँ
Post a Comment