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टंगा कोट

घर के एक कोने की खूंटी में 
टंगा बाबू जी के पुराने कोट सी 
मेरी धूसर भरी जिंदगी 
रोज देखती है 
विविध आयामों को 
भिन्‍न-भिन्‍न चेहरों को 
बहुत सारे घटकों को 
बस ! मजबूर हूँ 
क्योकि ? मै टंगे-टंगे
खूंटी से 
अब तार- तार हो चुका हूँ

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