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ग़ज़ल

सत्य के रामराज को घर-घर चलाना चाहिये ,
बेइमान रावनराज को घर-घर जलाना चाहिये||
हाथों में इंशाफ का तराजू नहीं तो क्या हुवा,
सोये ज़मीरो को तो अब जल्दी जगाना चाहिये ||
एक तरफ जवानी का गर्म लहू तो बर्बाद है,
वहा क्रांति का एक बीज जरूरी लगाना चाहिये ||
दरिन्दगी की आग से सीता छटपटाती रोज है,
अब आग को बुझाकर सीता को सम्भालना चाहिये ||
उठ रही है रोज अब दंगो की लहरें इस ज़मी पर,
नफरतो की दीवारो को अब प्रेम से ढहाना चाहिये ||
सत्य के रामराज को घर-घर चलाना चाहिये,
बेइमान रावनराज को घर-घर जलाना चाहिये......... सर्वाधिकर सुरक्षित

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