बचपन में
खेलते खेलते
जब थककर घर वापस आता
तो माँ अपने मैले आँचल से
मेरे माथे का पसीना पोंछकर
अपनी गोद में रख लेती थी
शायद वही क्षण
मै अब चाहता हूँ
जब थककर दुनियादारी से
धक्के खाते हुवे भीड़ से
रेल की पटरियों को पार करते हुये
जब घर पहुंचता हूँ
और देखता हूँ मा की तस्वीर
पथरायी आँखो से
और सोचता हूँ-
मुझसे दूर मेरी माँ भी
और धूल साफ करती होगी
अपने आँचल से
मेरी तस्वीर को
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