काश ! मै अख़बार होता (सर्वाधिकार सुरक्षित)
काश ! मै अख़बार होता
तुम मुझे रोज़ फ़ुरसत से पड़ती
अपनी उंगुलियों को
होठों से लगा के
बार-बार मेरे पन्ने पलटती
मेरे अंदर की हर ख़बर को
दिल लगा के पड़ती
हर चित्र देखती
कभी-कभी मुझसे हवा भी करती
कभी अपने माथे से लगा लेती
मै तब कितना खुशनसीब होता
तुम घंटो मुझे देखती
मै घंटो तुम्हे देखता ,
काश ! मै अख़बार होता
तुम मुझे रोज़ फ़ुरसत से पड़ती...... भास्कर आनन्द तिवारी
तुम मुझे रोज़ फ़ुरसत से पड़ती
अपनी उंगुलियों को
होठों से लगा के
बार-बार मेरे पन्ने पलटती
मेरे अंदर की हर ख़बर को
दिल लगा के पड़ती
हर चित्र देखती
कभी-कभी मुझसे हवा भी करती
कभी अपने माथे से लगा लेती
मै तब कितना खुशनसीब होता
तुम घंटो मुझे देखती
मै घंटो तुम्हे देखता ,
काश ! मै अख़बार होता
तुम मुझे रोज़ फ़ुरसत से पड़ती...... भास्कर आनन्द तिवारी

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