दोस्तों ! बहुत दिनों से सोचा था कि एक ब्लॉग बनाऊँ,वक्त साथ हि नही दे रहा था,क्यो कि मेरे कदम वक्त से बहुत पिछड़े हुवे थे ,बस! कभी कभी डायरी के कोरे पन्नों पर कलम की नोक से गुदगुदी कर देता था, पर मन के बिखरे शब्द डायरी के पन्नों में ही बिखरे रह गये, वो पन्नो के अंदर ही अंदर यूं रह गये कि मानो वे सब सिसकियाँ ले रहें हों वैसे भी उन्हें मेरे सिवा कोई भी नही पड़ता था. दोस्तों बस ! अब मैं भी कागज और कलम को कुछ आराम देना चाहता हूं,कागज और कलम भी तो पिछले कई सदियों से हमारी सेवा करते करते थक गये होंगें .चलो ब्लॉग बनाकर कुछ नया करने कि कोशिश करते है.
दोस्तों ! बचपन से ही लिखने का शौक था, शायद इसकी वजह प्रकृति रही होगी छोटे बड़े झरने,नीला आसमान,बर्फ की चादर से लिपटे पर्वतों की चोटियाँ,शिखरों पर बने मंदिरों,गाँव की दशा,गरीबी में खुशी का माहौल,और ना जाने क्या-क्या देखकर मेरे ह्रदय में शब्द जाल बनने लग गये, और उन जालों को चाहकर भी मै समेट नही पाया.
इस ब्लॉग का "बिखरे शब्द" शीर्षक मैंने इस लिए लीया कि मै कई सालों से इस रंगीन दुनिया को देखकर हर घडी कुछ ना कुछ ख्याल करते रहता हूँ ,और इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी में मेरे वो ख्यालों के शब्द कहीं बिखर गये थे, उन्ही बिखरे शब्दों को सहेजने के लिये मै इस ब्लॉग को थोड़ा बहुत टाइम देकर आपके लिये प्रस्तुत कर रह हूँ, इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिये माफ़ी चाहूँगा .
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